दैवी, नैतिक और सामाजिक न्याय की अवधारणा - daivi-naitik-aur-samajik-nyay-ki-awadharanan
भूमिका न्याय किसी भी सभ्य समाज की आधारशिला होता है। जब मनुष्य अपने व्यक्तिगत, सामाजिक और आध्यात्मिक जीवन में संतुलन बनाए रखता है, तभी समाज में शांति और समरसता संभव होती है। भारतीय परंपरा में न्याय को केवल कानून तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि उसे दैवी, नैतिक और सामाजिक तीन स्तरों पर समझा गया है। ये तीनों अवधारणाएँ मिलकर मानव जीवन को धर्म, कर्तव्य और करुणा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं। 1. दैवी न्याय की अवधारणा दैवी न्याय का संबंध ईश्वर, प्रकृति और कर्म के सिद्धांत से है। भारतीय दर्शन में यह माना गया है कि संसार में कोई भी कर्म निष्फल नहीं जाता। मुख्य बिंदु: हर व्यक्ति को अपने कर्मों का फल अवश्य मिलता है। शुभ कर्म सुख का और अशुभ कर्म दुःख का कारण बनते हैं। दैवी न्याय समय से परे होता है, परंतु अचूक होता है। भारतीय ग्रंथों में दैवी न्याय: गीता में कर्मफल सिद्धांत उपनिषदों में ऋत (Cosmic Order) की धारणा रामायण और महाभारत में अधर्म के विनाश का संदेश दैवी न्याय मनुष्य को यह विश्वास देता है कि अंतिम न्याय सत्य के पक्ष में ही होगा। 2. नैतिक न्याय क...